जहांगीराबाद (सीतापुर) – रमजानुल मुबारक का आखिरी अशरा जहन्नुम से आजादी का है। इसी अशरे में दस रोज का ऐतफाक करने का अमल भी है। असल में ऐतफाक की हकीकत यह है कि बंदा हर तरफ से एक सू (एकाग्रचित्त) होकर मस्जिद में रहे। खुदा की इबादत और उसके जिक्र-फिक्र में लगा रहे। ऐतफाक में कोई खास इबादत शर्त नहीं है।
नमाज तिलावते कलाम पाक दीनी किताबों का पढ़ना या अल्लाह का जिक्र करना ,गरज जो इबादत जी चाहे करता रहे। इसी आखिरी अशरा की रातों में एक रात शब-ए-कद्र की आती है। इसमें इबादत करने का सवाब एक हजार महीने तक इबादत करने के सवाब से ज्यादा मिलता है।इस रात में हजरत जिब्रील अलैहिस्सलाम फरिश्तों की एक जमात के साथ तशरीफ लाते हैं और जिस बंदे को इबादत में मशगूल पाते हैं उसके लिए दुआ करते हैं। फरिश्ते आमीन कहते हैं।
इसी आखिर अशरा में आखिरी जुमा को अलविदा कहा जाता है जिसका लोग बहुत एहतिमाम करते हैं। अपने कस्बे और शहर की जामा मस्जिद में अलविदा की नमाज अदा करनी चाहिए।यह बातें कस्बा के मदरसा इस्लामिया कंजुल उलूम के हेडमास्टर मौलाना हाजी नफीसुल हक मजाहिरी ने एक तकरीर में कहीं।